
रिपोर्ट-इशिका सिंह
एक अद्भुत सेवा का मौका मिला है। यह कैसा शेल्टर है मैं जहां पर 56 डॉग्स रहते हैं।जिनमें से 7 या 8 को छोड़कर सभी दिव्यांग है।कुछ के दोनों पैर पैरालाइज़ड है।कुछ की दोनों आंखें नहीं है।किसी के पैरों पर ट्रेन चढ़ गई है।किसी के पैरों को एक्सीडेंट की वजह से काट दिया गया है।कुछ जन्म से नहीं चल पाते हैं।कुछ गंभीर बीमारी से ग्रसित हैं।कुछ को लोगों ने मार-मार कर हाथ पैर तोड़ दिए हैं।कोई ना कोई वजह है जो यह शेल्टर होम में है।उनमें से कुछ ठीक हो गए हैं लेकिन अपने घर नहीं जाना चाहते हैं शेल्टर होम छोड़कर।
(फाइल फोटो)
कजरा जी ने एक सोशल मीडिया पर पोस्ट वायरल की थी उनको इन पैरालाइज्ड गंभीर बीमारियों से ग्रसित स्वान के लिए एक ट्रॉली बालू की जरूरत थी।
ऐसे स्वान सीमेंट की फर्श पर नहीं रह सकते हैं उनको यदि बालू में रखा जाए तो लंबे समय तक जीवित रहते हैं। तू जहां बैठते हैं थोड़ा सा गड्ढा बना लेते हैं और उसके बाद में वह अपने शरीर को उसी गड्ढे में दबा कर बैठते हैं जिसकी वजह से वह लंबे समय तक जीवन जी पाते हैं फर्श पर उनके स्किन का झगड़ा होगा और वह अन्य बीमारियों से ग्रसित हो जाएंगे। बालू में बैठने के बाद एक ट्राली बालू लगभग 3 साल तक चल जाती है क्योंकि यह बालू है तो वह भी जाएगी इधर उधर चली जाती है वह लोग अपने पैरों से खोजते हैं तो इधर उधर हो जाती वह धीरे-धीरे कम होती रहती है।
शेल्टर होम का इतना बजट नहीं है इस बार की वह एक ट्राली बालू जिसकी लागत लगभग ₹31000 आ रही है। परंतु इन स्वानों को जिंदा रखना भी जरूरी है।
(फाइल फोटो)
इसलिए संस्थान ने यह जिम्मेदारी ली है कि इन दिव्यांग स्वानों के लिए एक ट्रॉली बालू की व्यवस्था संस्था कराएगी और इनको एक नया जीवन देगी।
जब कल हम इन से मिलने गए तो इनमें पाया कि इनमें निस्वार्थ मोहब्बत कूट-कूट कर भरी है। इनके नाम कुछ इस तरह से थे सोम , मंगल, बुध, लाली, डोली, कलकी, पिलकी, चुन्नी, रिंकिया , सखी, गोल्डी आदि।
एक तो उसमें 19 साल की हो रही है। बूढ़ी और बेबस।
जहां पर पहुंचे तो मुझे उन लोगों ने एहसास कराया कि हम उनके लिए बहुत पुराने जन्मो जन्म के पुराने दोस्त हैं कोई नए नहीं हैं उन सभी स्वानों ने मुझे एक झलक में ही अपना लिया। और हम भी अपना दिल दे बैठे हैं उन्हें। उनके साथ खेला मस्ती की और मन में उनकी जिम्मेदारी उठाने की ठान ली।